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मय्यत निकली।

                
                                                         
                            मुझसे बेहतर तो यां मेरी मय्यत निकली।।
                                                                 
                            
ज़मीं के दूर फ़लक में सियासत निकली।।

मैं भटकता ही रहा ज़माने भर में लेकिन,,
माँ के कदमों के तले मेरी जन्नत निकली।।

कब से ढूँढ रहा था जिस शख़्सियत को,,
उससे मिलती जुलती मेरी सूरत निकली।।

राज़ जितने भी छुपा के रखें थे ज़माने से,,
ज़िंदगी दफ़न हुई तो मेरी गुर्बत निकली।।

क्या जताते किसी पर के कोई था ही नहीं,,
सांस बहते हुए पानी की अमानत निकली।।

कितनी सस्ती थी मेरी मौत कोई रोया नहीं,,
मुझसे मंहगी तो यां मेरी ज़मानत निकली।।

किसी को अपना बनाते भी तो कैसे देव,,
किसी की चाहत भी मेरी क़ुर्बत निकली।।
-सुनील देव
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3 महीने पहले

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