मेरी जहाँ जगह थी वहाँ कोई और आ गया।।
लगता हैं ज़िंदगी का अब नया छोर आ गया।।
जिसको गले लगाके कभी वादे किए हज़ार,,
दूरी क्या बढ़ी जरा सी के कोई और आ गया।।
अब तो वफ़ा के मायने भी बदले से लग रहे,,
बादल किधर से उठकर ये घनघोर आ गया।।
क्या होगा अब हयात का इस कटघरे में यार,,
क़ातिल को तो बचाने उसका चोर आ गया।।
उसको तो इंतज़ार की क़ीमत भी नहीं मालूम,,
आंखों का सब्र उस ओर से इस ओर आ गया।।
बहते हुए दरिया को कभी तू गौर से तो देख,,
ऐसा लगेगा सैलाब ए ग़म सराबोर आ गया।।
अब कौन देखता है बूढ़ी आंखों को यहाँ देव,,
ज़माने में रोशनी का अब नया दौर आ गया।।
-सुनील देव
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