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इसी इंतज़ार में

                
                                                         
                            बैठें हुए हैं आज भी इसी इंतज़ार में।।
                                                                 
                            
आएगा कभी तो वो वस्ल ए बहार में।।

अफ़सोस ही रहेगा तुझसे ए ज़िंदगी,,
आयी ना तू कभी हिज़्र ओ क़रार में।।

मुझसे मेरे अपने ही बैठें है खफ़ा जब,,
कैसे किसे समझाएंगे ग़म गुसार में।।

पैमानें कितने पी गए हम भी दर्द के,,
चढ़ती नहीं है मय भी बादाख्वार पे।।

कमज़ोर तो नहीं थे, मगर क्या करें,,
हर पाँव उठ रहा है आज आज़ार में।।

बेवफ़ाई के किस्से हाथों हाथ बिक गए,,
मैं देखता ही रह गया खड़ा बाज़ार में।।

क्या कह रहे हो कुछ तो सोच लेते देव,,
मिलते नहीं है जो मिलते हैं मज़ार पे।।
-सुनील देव
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2 महीने पहले

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