आँखें भी दी है कमाल के देखती नहीं।।
कुछ भी करे या लाल की देखती नहीं।।
हरकत जो देखी आज तो चुप रह गया,,
पलकें ने किए सवाल मगर देखती नहीं।।
'उजलत में तेरी हम भी खा गए धोखा,,
होती जो ये तालमताल तो देखती नहीं।।
लिखती है ख़त पे ख़त मुझको रोज़ वो,,
रखती तो है संभाल के पर फेंकती नहीं।।
ताज़ा ग़ज़ल लिखी हैं पढ़ना तू गौर से,,
क्या क्या किया मलाल क्यूँ देखती नहीं।।
माथे पे तेरे चाँद बड़ा खिल रहा है मगर,,
बिंदिया को हैं मलाल के तू देखती नहीं।।
आजा के अब तो कुछ बचा नहीं है देव,,
कैसी अज़ब है चाल के तू देखती नहीं।।
-सुनील देव
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X