रहती हैं इक निगाह मेरे आस पास ही।।
जब तक है चल रही हैं घड़ी आस की।।
इक दिल ही तो अपना ये जैसा सोच ले,,
होती नहीं है यहाँ कोई वज़ह उदास की।।
यूँ तो नसीहत हर कोई देता ही है मगर,,
बदली ना सोच देख लो इस समाज़ की।।
चले जाएंगे इक रोज़ वो दिन भी आएगा,,
होती नहीं यारों यहाँ हर शब मज़ाक की।।
कितने ही आए आके बस यूँही चले गए,,
रहती नहीं हमेशा यहाँ ख़ुशी गुलाब की।।
दौलत मिली तो ज़िस्म से जान छीन ली,,
क़दमों तले ज़मीं ना रही बद-हवास की।।
मजबूरियों के नाम पर ही लुटते रहे है देव,,
जब भी मिली है ज़िंदगी इक किताब सी।।
-सुनील देव
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