आदमी को आदमी से अब आदमियत ना रही।।
क्या हुआ अब इस जहाँ में इंसानियत ना रही।।
कारगुज़ारी में कहीं दिखता नहीं दिल से कोई,,
ऐसे लगता हैं के जैसे अब ज़रूरियात ना रही।।
हर कोई गुमनाम है यां बस अपनी ही तन्हाई में,,
कहने को आज़ाद है मगर कहीं हुर्रियत ना रही।।
इश्क़ की आदत में पड़कर खो गई जवानी मेरी,,
अपना भी वही हाल हैं के अब शर्रिय्यत ना रही।।
यूं तो हर कोई पास है और साथ में रहता भी है,,
दिल के जैसा हाल सबका के मौजूदयत ना रही।।
हर कोई अपने मजे में जिए जा रहा बस ज़िंदगी,,
शहर सब का ख़्वाब लेकिन शहरियत ना रही।।
वो मुझे अब देखकर देव नज़रे चुराने लग गया,,
शायद अपनी आँख में कोई शोरिय्यत ना रही।।
-सुनील देव
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