कुछ खोज रहा हूं,
मगर क्या?
यही बार - बार ,
सोच रहा हूं.....!!
चला तो था,
तुम्हे खोजने,तुम्हारे होने का एहसास पाने ,
तुमको महसूस न कर पाने के दुःख को,
हृदय से उतार फेंकने,,
किंतु पास आया तुम्हारे तो,
ये आभास हुआ,
कि तुम तो खुद ही खाली हो खुद से,
और जो दिखती हो,
वो खंड - खंड में बँटी हुई एक
पारिवारिक औरत है,
जिसका स्वार्थ सिर्फ स्वयं के
लिए जीना है,
तुम और तुम्हारे लोगों के लिए,,
अब जाकर ये जाना हमने,
इस आपाधापी ,दौड़ भाग में
खुद को ही मै खोज रहा हूं।।
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