लगने दो जिस को जो लगता है,
यहाँ अच्छे - अच्छों को बुरा लगता है।
किस - किस को दिखाओगे तुम
अपना दिल, दिमाग, चेहरा, बदन?
जिस को समझना होता है,
वो एक बार में ही समझ जाता है।
यहाँ दशकों बीत जाते है,
लोगों को अपना, अपना नहीं लगता है।
लगने दो जिस को जो लगता है,
यहाँ अच्छे - अच्छों को बुरा लगता है।
साबित करना क्या है किसी को?
तुम इंसान हो।
इंसान को इंसान कहना आसान है।
इंसान बनने में ही तो वक्त लगता है।
लगने दो जिस को जो लगता है,
यहाँ अच्छे - अच्छों को बुरा लगता है।
ये महफ़िल चार दिन की है मेरे दोस्त,
झुठ नहीं कहते है लोग।
अटल सत्य है यही
नश्वर होने के बाद ही
तारीफ़ करते है चार लोग।
और वही चार लोग जीते जी पूछते भी नहीं।
तो,
क्या फ़र्क पड़ता है।
लगने दो जिस को जो लगता है,
यहाँ अच्छे - अच्छों को बुरा लगता है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X