तुम मुझे जानते हो कितना?
कि मेरे बारे में कहने चल दिए।
कहानी के अंशों का पता होना
कहानी कहना कह दिए।
सारांश को समपूर्णता कह दिए,
हर चीज़ को व्यक्तिगत जोड़ दिए।
तुम मुझे जानते हो कितना?
कि मेरे बारे में कहने चल दिए।
बिताई क्या एक सदी दिन -रात
मेरे साथ?
मैं किस नासिका से भरता हूँ
मध्यम साँस जानते हो क्या?
मेरी साँसों तक से वास्ता नहीं तुम्हारा।
तुम मुझे जानते हो कितना?
कि मेरे बारे में कहने चल दिए।
मेरे जेहन - ओ -दिल की बातें,
मेरी हँसी की वज़ह, मेरी गमों की रातें।
मेरे अल्फ़ाजों को क्या कभी जोड़ा खुद से?
तुम मुझे जानते हो कितना?
कि मेरे बारे में कहने चल दिए।
लिखवाट मेरी को कटाक्ष कहोगे,
तीखा व्यंग, व्यक्तिगत अलोचना कहोगे।
तुम तुम्हारे विचारों को जानते हो भला,
मेरी तो कला को भी फ़िजूल कहोगे।
तुम मुझे जानते हो कितना?
कि मेरे बारे में कहने चल दिए।
जानता हूँ तुम्हें बस इतना मैं
कि इंसा हो तुम,
तुम्हें तो रब से भी गिला है।
जो मिला है वो कम लगा है,
तृप्ति होती नहीं तुम्हारी।
जो प्रेम दो, तभी तो जूता पड़ा है।
तुम मुझे जानते हो कितना?
कि मेरे बारे में कहने चल दिए।
कहानी के अंशों का पता होना
कहानी कहना कह दिए।
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