नारी तू सर्व ज्ञानी है।
माना तुझ में भी खामी है।
तू संशोधन करती जाती है।
नर निरा मूर्ख प्राणी है।
सर्व समर्थ होना उसकी
कामयाबी है?
बोझिल होना उसका
जिम्मेदारी है ?
वो भी तो अधुरा है।
तेरे संग ही तो पूरा है।
आधा सच तेरा है।
आधा सच उसका है।
पूरा सच कौन जानता है?
तू धीरज है, वो प्रयास है।
तू शक्ति है, वो रूपक है।
तू चोटिल है, वो क्षमा - प्रार्थी है।
तुझ से ही तो उसे एहसास है।
कर गुजरने की ललकार है।
प्रेम पात्र है तो उस के जीवन का।
लेखन तू ही तो करती जाती है।
तेरा जग भी तो उस बिन सूना है।
तेरी किलकारी उसका देना है।
तू भी तो सब जानती है।
तू सर्व ज्ञानी है।
नर को इंसा, इंसा को प्रेम
तू ही तो बनाती है।
नारी तू सर्व ज्ञानी है।
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