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जिंदगी ने कुछ इतना अच्छा किया

                
                                                         
                            जिंदगी ने कुछ इतना अच्छा किया
                                                                 
                            
बिन मांगे सब कुछ दिया।
मेहनत भी की
मन्नत भी की
थोड़ी कामयाबी के साथ थोड़ी हिम्मत मिली
आरज़ू सबकी बढ़ती रही
पर, अब धीरे-धीरे दब रही हूँ
तले आरज़ू के घट रही हूँ।
बड़ी कमज़ोर ये कहानी हो जायेगी
लगता है कब मुकम्मल ये हो जायेगी

हर बार नये सपने सजते हैं
किसी के कई लम्हे बनते हैं
बिगड़ते हैं
थोड़ी फटकार से पूरा दरिया बहा देती हूँ,
हर जगह में ये जता देती हूँ,
कितनी नाजुक मेरी जिंदगानी
लम्हों में ही इसे निपटा देती हूँ।

ख्वाबों के कारवां में चलती जा रही हूँ
अपने सपनों में बढ़ती जा रही हूँ।
एक दिन कुछ कर दिखाऊंगी,
सबके मुंह पे ताला लगाऊंगी।
घर में बैठ बस खुद को खुश करके
अपने जहाँ को रोशन बनाऊंगी
फिर आयेगी सबकी बारी सपने सबके
मैं सजाऊंगी सब को सपने फिर
मैं दिखाऊंगी।
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2 घंटे पहले

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