गुजरे हुए दिनों के सारे सवालात पर
रो के हंस पड़े हैं माजी की याद पर
सावन की एक बूंद जैसे तन पे गिरे है
वैसे ही बरस जाता इश्क़ मेरी जात पर
तुम भूल कर भी ना भूले ये ही जीत है मेरी
वरना हार मेरी हो जाती तेरी याददाश्त पर
इश्क़ में जला है कुछ राख हुआ होगा
सब सोना नहीं बनता है इस आग पर
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