आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

शब्द साधना कैसे बयां करूं

                
                                                         
                            कैसे बयाँ करूँ
                                                                 
                            

काग़ज़ पे दर्द-ए-दिल के निशाँ कैसे बयाँ करूँ,
आँखों है छुपा धुआँ, कैसे बयाँ करूँ।

लफ़्ज़ों में ढाल दूँ तो स्याही भी रो पड़े,
एक अनकही दास्ताँ कैसे बयाँ करूँ।

तेरे बिना भी साँस तो लेती रही हूँ मैं,
तेरे सफर का रास्ता कैसे बयाँ करूँ।

चाहा बहुत कि भूल ही जाऊँ तुझे मगर,
यादों का कड़ा इम्तिहाँ कैसे बयाँ करूँ।

हर साँस में आज भी बस नाम तेरा है,
रूहों का ये कारवाँ कैसे बयाँ करूँ।

तेरी यादों ने मुझको मेरा आईना दिया,
फिर टूटता हुआ जहाँ कैसे बयाँ करूँ।

अपनों की निगाहों ने सच-झूठ सब कहा,
दिल पर छपे वो निशाँ कैसे बयाँ करूँ।

तुझको मैं काग़ज़ों पे उतारूँ भी किस तरह,
ना बन सके ऐसी क़लम, कैसे बयाँ करूँ।

दौलत के लालची भुला देंगे एक दिन ,
दिल मानता नहीं ये गुमाँ, कैसे बयाँ करूँ।

'विंध्य' ये शब्द कहानी नहीं कोई,
जीती हूँ जिसमें रोज़ यहाँ, कैसे बयाँ करूँ।।
-साधना मिश्रा विंध्य
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर