गयी कहां धूप, बादल छुपाने लगा है।
रवि तेरा रूप , आहिस्ता चुराने लगा है।
कौन घड़ा मेघ का, फोड़ की है शरारत
करके मुंह मेरा चुप, आब बरसाने लगा है।।
~सद्दाम हुसैन
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