अल्फ़ाज़ बनकर जो पन्नों पर ठहर जाती हैं,
किताबें ही तो इंसान को खुद से मिलाती हैं।
जब राहों में सन्नाटा हो और कोई साथ न दे,
ये खामोश सफ़र में चलना सिखाती हैं।
किसी का इंतज़ार मत कर ऐ राही,
तू अकेले चलने का दम तो रख।
किताबों के ज्ञान को अपनी ढाल बना,
और हर मुश्किल में मुस्कुराने की आदत रख।
बस एक पहला कदम बढ़ाना ही काफी है,
मंजिलें खुद-ब-खुद तेरे करीब आएंगी।
आज जो तन्हाई में तू इतिहास पढ़ रहा है,
कल दुनिया तेरे ही पीछे-पीछे आएगी।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X