आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सब फीके हैं तेरे समर्पण के।

                
                                                         
                            हे तरुवर!
                                                                 
                            
तरुवर! तू स्थूल है,
मेरा मन व्याकुल है।
जब से जनमा इस धरती पर,
तब से संघर्ष मिला तुम्हें।
बीजकोष से छँटकर तू जब,
लिपटे माँ के आँचल से।
रवि, नीर और पवन को पाकर,
स्फुटित हुआ जीवन तेरा।
अनुशासन का पाठ देख कर,
मुग्ध हुआ यह मन मेरा।
शांत, निर्भीक खड़े होकर तुम,
प्रेम लुटाते हर जीव में।
जीवनदायिनी को शीतल छाया देना,
हर जीव का फर्ज बने।
यह संदेश देकर जग में,
कैसे चुकाना कर्ज हमें?
आखिर, इस जग की खातिर,
उपकार हमें जो करना है।
हे तरुवर! मैं निःशब्द हूँ,
गुणगान कैसे हमें करना है?
यश, वैभव, ऐश्वर्य, कीर्ति—
सब फीके हैं तेरे समर्पण के।
एक आशीष हमें भी दे दो,
समर्पण का भाव बने जग में।
- रूपेश कुमार साहू
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर