हे तरुवर!
तरुवर! तू स्थूल है,
मेरा मन व्याकुल है।
जब से जनमा इस धरती पर,
तब से संघर्ष मिला तुम्हें।
बीजकोष से छँटकर तू जब,
लिपटे माँ के आँचल से।
रवि, नीर और पवन को पाकर,
स्फुटित हुआ जीवन तेरा।
अनुशासन का पाठ देख कर,
मुग्ध हुआ यह मन मेरा।
शांत, निर्भीक खड़े होकर तुम,
प्रेम लुटाते हर जीव में।
जीवनदायिनी को शीतल छाया देना,
हर जीव का फर्ज बने।
यह संदेश देकर जग में,
कैसे चुकाना कर्ज हमें?
आखिर, इस जग की खातिर,
उपकार हमें जो करना है।
हे तरुवर! मैं निःशब्द हूँ,
गुणगान कैसे हमें करना है?
यश, वैभव, ऐश्वर्य, कीर्ति—
सब फीके हैं तेरे समर्पण के।
एक आशीष हमें भी दे दो,
समर्पण का भाव बने जग में।
- रूपेश कुमार साहू
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