आओ बताते हैं यह सब कैसे हुआ?
हर इंसान खेल रहा है जुआ।
यह तो सबके अंदर है समाया,
हर किसी ने है रिस्क उठाया।
किसान ने है देखो फसल लगाया,
नीले आकाश में बादल नहीं मंडराया।
देख उसका मन विक्षेपित हुआ,
हर इंसान खेल रहा है जुआ।
छात्रों ने तन मन से खूब की पढ़ाई,
दिन रात कब हुआ उसको समझ ना आई।
देख रिजल्ट मन दुखी हुआ
हर इंसान खेल रहा है जुआ।
दो टीमों के बीच देख लगी है लड़ाई,
इसको देखने को तगात बड़ी है आई।
जो हारेगा देख कैसे चकना चुर हुआ,
हर इंसान खेल रहा है जुआ।
देखो चुनाव का माहौल है जब आता,
नेता लोग एक दूसरे का बुराई है बताता।
हर कर उसका कितना नुकसान हुआ,
हर इंसान खेल रहा है जुआ।.......
-रुपेश परदेशी
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