तुम स्त्री हो, तुम्हें हद दिखाई जाएगी
जब तुम्हारी बारी होगी, तुम्हें भरमाया जाएगा
जब वो पाएंगे तुम उन पर भारी हो।
सदियों से चला आ रहा ये क्रम,
तुम्हें चाची, मामी, माँ भी यही कहेगी—
किन-किन से बगावत करोगी?
कहकर,
सैकड़ों उदाहरण भी देगी।
जो उलझा वो फिर सुलझ न पाया,
जिसने सिर उठाया उसने सर्वस्व गँवाया,
तुम न पहली, न आखिरी होगी,
चीख-चीख कर कहेंगी।
मैं सोचती हूँ, स्त्रियों ने कितना कुछ सहा होगा!
सहते-सहते थक कर ठूँठ हुई होंगी,
पर किसी से अपनी व्यथा न कही होगी।
जो कहती भी होगी,
तो खुद को ही दोषी साबित पाती होगी।
सदियों से किसी ने पनघट पर, तो कभी पगडंडी पर,
पल्लू खींचकर जबरन आलिंगन कर अपनी हवस मिटाई होगी।
फिर वह स्त्री मरी होगी, या खुद की जिंदा लाश बनाई होगी?
माधव, कान्हा और भगवती से कह-सुनकर
जाने क्या-क्या दर्द सुनाई होगी!
सुनो!
तुम अब नई पहल करो,
मिलो न सही, कुछ कदम चलो।
दरिंदों के खिलाफ एक जंग छेड़ो
इस सफर में मिलेंगे हज़ारों आलोचक, इक्का-दुक्का समर्थक।
कुछ दबाव में, कुछ प्रभाव में,
हो सके तो वे भी विरोधी हो जाएँ,
पर तुम डटे रहना, एक-एक कदम चलते रहना।
इस सफर में सराहना से अधिक आलोचना होगी।
तुम आलोचना सहना, तिरस्कार सहना,
सहना तुम जाहिलों की दुत्कार भी,
परंतु—
नहीं सहना पल्लू का खिंचना,
नहीं सहना आँखों की वह टकटकी,
नहीं सहना किसी की नशीली आँखों से तकना।
किसी के हवस की टीस मत सहना!
मत सहना यह सुनना कि "स्त्रियों का काम है आदमियों की ख़ुशी के लिए बिस्तर लगाना।"
मत सहना यह सुनना कि
स्त्री ईश्वर ने पुरुष के मनोरंजन के लिए बनाई है।
मत सहना उनका ज़ोर, शोर और थप्पड़!
यह सब न सहने की इस राह में,
जो भी तुम्हारा साथ दे,
तुम उसे देना असीम प्रेम ,
ममत्व से सींचना,
स्त्रित्व से आलिंगन करना।
चूमना उसके माथे को, सहलाना बालों को,
भरना बाँहों में—जैसे बादल बरसकर धरती में समा जाता है।
फिर रचना ऐसी सृष्टि,
जिसमें स्त्री को पुरुष हवस से नहीं,
स्त्रित्व से जाने, ममत्व से जाने,
जाने सृजनकर्त्ता से ।
-रूपा कुमारी
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