कश्ती ही जाने
किनारों का सफ़र क्या होगा,
मन ही समझे इन जज़्बातों
पर असर क्या होगा।
संयम से चीज़ें सँभल तो जाती हैं,
मगर...इस ढलते हुए वक्त का न
जाने हश्र क्या होगा...और
समय बीत जाने पर जो मिला भी तो क्या,
उस देर से मिली खुशी का
भला असर क्या होगा...
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