था मै अलग –थलग,
दर्द के हर आँगन से।
तन्हाई ने देखा जब,
दिल की मुस्कुराहट को।
मुस्कुराकर अश्कों को ,
नयनो में बुला लिया ।
आसमां की नरमी ने ,
तन्हाई की क्रूरता को।
बादलों को बुलाकर,
घटा को सज़ा दिया।
तड़पन के अश्क़,
बादलों के घटा संग।
भिगोने लगे है अब,
नयनों की पुतलियों को।
निकल कर कराह अब,
बदन की धमनियों से।
चेहरे के नूर को
, छुपाने लगी है।
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