मैं नहीं जनता हूँ तुम कौन हो?
न ही मुझे बीता कल याद आता है,
बस जब गुज़रता हूँ तेरे शहर से
कुछ मुलाक़ातें याद आती हैं,
यक़ीन दिलाती हुईं तुम्हारी
कुछ बातें याद आती हैं….!
ठिठुक कर मुड़कर देखता हूँ
हम दोनों सा कुछ धुंधला-२ नज़र आता है,
मैं नहीं जानता….
जब होती है मेरे शहर में बारिश
मुझको तुम्हारा रोना याद आता है,
ये आँशूँ मोती है,ये समझाता हुआ
मेरा तेरे पास होना याद आता है,
बारिश रुक जाती है,बहता पानी रुक जाता है
ठीक वैसे,जैसे मेरे लिए तुम्हारे प्रेम का बहाव,
सोंच कर मैं भी बह जाता हूँ उसी पानी में
इश्क़ का भी होता है,ज़िंदगी में एक पड़ाव
और बहकर मिल जाता हूँ,जिम्मेदारियों के सागर में,
जहाँ एक नदी के न मिलने से सागर उसके पीछे नहीं आता है,
मैं नहीं जानता हम तुम कौन हो?…..
-रोहित तिवारी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X