द्वार हमारे गूँज उठी है, नन्हीं सी इक ताली रे,
सूने पड़े हुए उपवन में, आई नव-जयमाली रे।
पलक मूँदकर सोई गोदी, प्रात काल की लाली रे,
इस पावन आगम ने हर ली, मन की सब बदहाली रे।
देखे मुखड़ा जब भी माता, ममता जल बरसाती है,
दूध पिलाकर थपक-थपक कर, सुंदर लोरी गाती है।
पिता निहारे चंचल सूरत, मिटती मन की व्याकुलता,
हृदय तंतु पर छिड़ जाती है, अनुपम अद्भुत कोमलता।
दादी लेती सदा बलैयाँ, दादा का मन हर्षाए,
चाचा-चाची दौड़-दौड़कर, अपनी गोदी हर्षाए।
पूरा कुनबा मगन हुआ है, पाकर यह वरदान नया,
इस नन्हीं सी परछाई से, आँगन को जगतान मिला।
पलट-पलट कर चतुर परी वह, अपनी गति दिखलाती है,
पकड़ अँगूठा इस जीवन का, करवट लेना सीखती है।
हिल-डुल कर वह ज़मीन ऊपर, धीमे कदम बढ़ाती है,
बाबा के चश्मे को छूकर, मन ही मन मुसकाती है।
तोतली बोली के सागर में, मिश्री सी घुल जाती है,
पापा-पापा कहकर जब वह, कंठ हमारे लगती है।
माथे ऊपर लगा हुआ है, छोटा काजल टीका रे,
इस निष्पाप रूप के आगे, जग का वैभव फीका रे।
अपनी छोटी सी गुड़िया को, माता बनकर पाल रही,
काग़ज़ की कोरी छाती पर, टेढ़ी रेखा डाल रही।
अभी नहीं वह बड़ी हुई है, अभी तो नन्हा सावन है,
जिसके छोटे से जीवन से, महका सारा आँगन है।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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