है वो तिनका, जिसे ढूँढा सारा जहाँ,
मिला न कोई तिनका, जिसका इशारा मिला।
गैरत हैं सब, बस तेरी याद है,
गिला नहीं कि याद हो तुम मुझको,
शिकवा है कि भूल न पाया तुमको।
बस गिरकर संभलता रहा मैं,
तेरी इस डगर पर
बहुत ढूँढता रहा मैं।
अब तो सब्र-हिम्मत नहीं,
बस ज़ंजीर-सी बची है,
जो बाँधे हुए है मुझे।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X