तुझे लगता है , तर हैं अब्र ए आरज़ू मेरे ? ,
इक दफा चल मेरी किस्मत के ख़ज़ाने तो सही,
रेत ही रेत है कयासों के सिवा कुछ भी नहीं।
तेरी नज़रों में कुछ हाथों में दबा है मेरे,
खोलकर देख अधूरी लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं।
यकीं नहीं है गर इकरार ए जुबां पर मेरे,
कर तलाशी यहां खाली के सिवा कुछ भी नहीं।
जो भी हासिल है चंद पन्नों में दबा है मेरे,
कोरे कागज़ में समंदर के सिवा कुछ भी नहीं।
डूब कर ढूंढ मुझे स्याही के समन्दर में मेरे,
सच ! यहां हर राज़ बयां है छिपा कुछ भी नहीं।
यूं तो सब कुछ है मगर खाली के सिवा कुछ भी नहीं।
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