जान सा तू हमें, हमारा लगे,
ऐ वतन चांद से भी तू प्यारा लगे,
जंग सारे खतम हो चुके हैं,
दुश्मनों के सिर अबतक झुके हैं,
हौसला दो, अब नई रेस में
चल सकें आबादियां,
आपसी भेद–भाव की,
छोड़कर गुस्ताखियाँ,
मंजिलों की लिए सौ कतारें खड़ी,
कश्तियां आ बड़ी से बड़ी,
पर बनारस के घाटों के जैसी,
तू सबका किनारा लगे,
जान सा तू हमें, हमारा लगे,
ऐ वतन चांद से भी तू प्यारा लगे।
राजनीतियों की तानाशाही चरम पर,
इक तरफ उग्रवादिता युवाओं का घर,
लिख दूं किसे आज?
इतिहास से किसको मिटा दूं?
गोलियां किसपे चला दूं?
दिल में किसको जगह दूं?
हर तरफ हैं फैलें तुम्हारे सभी,
हमारे सभी, हमारे सभी,
मेरी चिंताओं का, तेरी प्रार्थना ही–
अब, इक सहारा लगे,
जान सा तू हमें, हमारा लगे,
ऐ वतन चांद से भी तू प्यारा लगे।
– ऋषभ भट्ट
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X