रात घनेरी कट जाएगी,दिन का उजाला रह जाएगा।
पर खबर तुम्हें तो ये भी है, फिर से रात घनेरी है।
फिर से रात घनेरी है............2
बना जो रखी बस्ती नफ़रत की,गिर जाएगी ढह जाएगी
प्रेम यहां बस रह जाएगा, बाक़ी मन की फेरी है।
पर खबर तुम्हें तो....................... रात घनेरी है।
पथ से फिर क्यों भटक रहे,जब जान रहे मंजिल इस पर
फुलझडियां कितनी आएंगी,ले जाने तुझको बेपथ पर।
गर मचल गए तो उलझ गए, फिर सुलझाने कोई न आए
जो बैठे रस्ता देख रहे, तू गिर जाए-तू गिर जाए।
फिर उसे फरिश्ता मान रहे क्यों,जब जान रहे कि शिकारी हैं।
पर खबर तुम्हें तो..................... रात घनेरी है।
क्यों रूठे बैठे हो ,दो बातों पर अपनो से ।
क्यों बिखरे रहते हो, हार कदम एक सपनों से।
क्यों इधर उधर खो जाते हो,सुनकर बातें गैरों की।
उठते को गिराना नीचे, आदत है इन शहरों की।
सब समझ रहे सब जान रहे,पर बात नहीं स्वीकारी है।
पर खबर तुम्हें तो....................... रात घनेरी है।
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