आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हे वायस विकराल!हे कृष्टि महाक्लेश!

                
                                                         
                            एक मृत शव शेष परे ,
                                                                 
                            
धरनी के धर पर क्लेश परे ।

हे पौरुष प्राण!हे समर अनिमेष!
हे वायस विकराल!हे कृष्टि महाक्लेश!
हे अनभ्र हे तड़ित देव,
हे भासमान भयंकर भगवान!
सत्वर हरो प्राणी के प्राण!
हे तृण के तंत्री विशाल!
जागो जागो कुत्सित काल!
उठो उठो क्षति कर क्षितिज
ले उदधि,उदय हो उद्भिज
फोड़ फोड़ पतित काय को
तल-अतल-रसातल-पाताल
लेकर आओ लोक -ज्वाल
डहकेंगी कलुष काया
झुलसेगी चिता पर माया
देख मंडरा रही काक
बनाकर शव का पाक
दिगंत से आ रही दानवी
नर्तन करते नकारते पथ
कर देगी क्षीण दानवी दानवी
उगो हो भानु आओ भानु सुत !
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर