समझा उसे, समझा उस दुख को,
जिसको चाहा, समझा मैंने उसको।
ना चाहा समझाना ज़रूरी ख़ुद को,
फिर भी चल पड़ी समझने उसको।
हाय, क्या कहें, क्या ना कहें,
दिखते नहीं जो दुख, उन्हें रूह से निकली आह सुनाई नहीं देती,
दिल की धड़कन कभी दिखाई नहीं देती।
महसूस करने को हम प्यार भी कर लेते,
मगर धोखे भरी दुनिया में सच्ची नहीं देखी।
दुख में भी कोई ख़ुशी मिले,
और ख़ुशी में छुपा कोई ग़म मिले।
ग़म में समझा मैंने उसको,
हर दर्द में ढूँढा मैंने उसको…
बस एक सवाल रह गया दिल में—
उसने क्यों ना समझा हमको?
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