व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का दीक्षांत समारोह
प्रवेश द्वार पर लिखा था चमकते अक्षरों में —
"ज्ञान वही जो फॉरवर्ड हो, सत्य वही जो वायरल हो!"
दीक्षांत समारोह में पहुँचे थे छात्र बड़े गर्व से,
डिग्री थी ‘डॉक्टर ऑफ गपशप’, ‘प्रोफेसर ऑफ भ्रम’ के गर्व से।
- कोई आया था "5G से कैंसर" का शोधपत्र लेकर,
- कोई "नींबू से कोरोना भागे" का प्रमाणपत्र लेकर।
.. 95 की आयु के लिए य़ह पी लो..
एक ने बताया —
"चंद्रयान असल में रामायण से प्रेरित था,"
दूसरे ने कहा —
"NASA ने वेदों से ही विज्ञान सीखा था!"
प्रश्नोत्तर सत्र में पूछे गए गंभीर सवाल —
- "क्या पृथ्वी सपाट है?" — उत्तर: "हाँ, व्हाट्सएप पर देखा था!"
- "क्या ऑक्सीजन पेड़ नहीं, गोमूत्र से मिलती है?" — उत्तर: "बिलकुल, वीडियो वायरल था!"
प्रोफेसर ने कहा —
_"तथ्य से बड़ा विश्वास है,
जो मन को भाए वही विज्ञान है!"_
लाइब्रेरी में किताबें नहीं, सिर्फ ग्रुप चैट्स थीं,
जहाँ ज्ञान का स्रोत — "मेरे चाचा ने बताया था" जैसी बातों से भरी थीं।
प्रैक्टिकल क्लास में सिखाया गया —
- "कैसे बिना पढ़े बहस जीतें,"
- "कैसे हर बात में विदेशी साजिश ढूंढें,"
- "कैसे हर वैज्ञानिक खोज को पुराणों से जोड़ें।"
दीक्षांत भाषण में कुलपति बोले —
_"हमारे छात्र अब तैयार हैं —
हर बहस को भटकाने,
हर तथ्य को तोड़ने,
हर अफवाह को उड़ाने!"_
अंत में सबको दी गई डिग्री —
_"बी.ए. इन भ्रम विज्ञान,
एम.ए. इन अफवाह प्रबंधन,
पीएचडी इन फॉरवर्ड थ्योरी!"
जहाँ ज्ञान का स्रोत व्हाट्सएप हो,
वहाँ तर्क, तथ्य और विवेक को छुट्टी देनी पड़ती है।
-रमेश मेंदीरत्ता
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