कुछ साथ लाये अपने नेह की बूंदें ।
प्यार का उमड़ता सागर ले आये।
जो प्यासी धरती की प्यास बुझाये।
कराये श्रंगार धरा को नवयौवन सा भर जाये।
इक इक बूंद में भर अमृत की धारा
कर बौछारें धरती को निर्मल कर डाला
सूखी सी मिट्टी के हृदय में सिरहन सी होने लगी
बन प्रेम का ऐहसास
हरियाली की चादर बुनने लगी।
कुछ नेह की बूंदें....
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