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राह का राही

                
                                                         
                            भटक रहा है मन का पंछी,
                                                                 
                            
सूनी है हर राह यहाँ,
छूट गया वो लाड़ पुराना,
खोया वो साया था जहाँ।

धूल जमी है सपनों पर पर,
साँसों में थोड़ी हलचल है,
माना आज अंधेरा गहरा,
पर कल का दिन तो उज्ज्वल है।

चादर छोटी, जेबें खाली,
फिर भी एक अभिमान बचा,
दुनिया की इस भीड़ में देखो,
मेरा भी उत्थान बचा।

खोया-खोया घूम रहा हूँ,
खुद से ही अनजान हूँ मैं,
कोई पूछे नाम तो कह दूँ,
घायल एक इंसान हूँ मैं।

सोच का बोझ हटाकर अब तो,
आगे कदम बढ़ाना है,
माँ की ममता, पिता की सीख को,
जीवन में अपनाना है।

सोए सपने जाग उठेंगे,
हिम्मत का जब साथ मिलेगा,
पतझड़ की इस सूखी रुत में,
फिर से कोई फूल खिलेगा।

जीने की उम्मीद न छोड़ी,
यही मेरी पहचान यहाँ,
आज भले ही मिट्टी न हो,
कल होगा आसमान यहाँ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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