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उल्फ़त... और क्या है

                
                                                         
                            जो दर्द दिल में रहे और असर न दिखाए,
                                                                 
                            
ऐसी ख़ामोश उलफ़त की आरज़ू क्या है।

ज़ख़्म सीने में छुपाकर भी मुस्कुराते हो,
किसी से कह न सको तो, ये गुफ़्तगू क्या है।
जिसे महसूस ही न हो, किसी की तड़प कभी,
उसके लिए फिर ये दिल, ये आरज़ू क्या है।

जो आँसुओं में उतर आए किसी का ग़म,
उसी एहसास को कहते हैं उलफ़त… और क्या है।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
1 सप्ताह पहले

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