आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तितली का दीवाना

                
                                                         
                            तमन्ना चाँद पाने की थी,
                                                                 
                            
लेकिन दिल तो तितली का दीवाना था।
बचपन की ख़्वाहिशें भी अजीब थीं…
आसमान को छूने का सपना,
और ज़मीन पर हर रंग के पीछे, भागने का बहाना।
तब कदम,
एक जगह ठहरना, जानते ही कहाँ थे।
सुबह स्कूल की घंटी,
दोपहर बस्ते का कोना,
और शाम होते-होते,
गली का क्रिकेट मैदान,
हमारा असली पता बन जाता था।
घर पहुँचते ही,
माँ की आवाज़ आती…
"पहले खाना खा लो..."
और हम कहते…
"बस पाँच मिनट..."
वो पाँच मिनट,
अक्सर सूरज ढलने तक खिंच जाते थे।
ईंटों के विकेट,
टेनिस बॉल,
और बैट पर लगी पुरानी टेप…
यही हमारी दुनिया थी।
जिस दिन किसी ने छक्का मार दिया,
उस दिन वह पूरे मोहल्ले का
सबसे बड़ा खिलाड़ी बन जाता था।
मैच ख़त्म होने के बाद भी
शाम ख़त्म नहीं होती थी।
गली के नुक्कड़ पर,
दोस्तों की महफ़िल सजती।
कोई मास्टर जी की नकल उतारता,
कोई अपनी बनाई हुई कहानी को,
सच साबित करने की कोशिश करता।
हँसी के ऐसे ठहाके लगते,
कि लगता पूरा मोहल्ला,
हमारे बचपन में शामिल हो गया हो।
न मोबाइल था,
न इंटरनेट,
फिर भी ख़बरें सबसे पहले,
हम तक ही पहुँच जाती थीं।
किसके घर नया रेडियो आया,
किसकी साइकिल पंचर हुई,
किसने आम के, बाग की बाउंड्री से छलाँग लगाई…
हर बात पर घंटों बहस होती थी।
शाम ढलती,
आसमान में पहला तारा निकलता,
तब कहीं जाकर याद आता…
होमवर्क भी करना है।
जल्दी-जल्दी कॉपी खोलते,
लिखाई से ज़्यादा,
नींद आँखों में उतरती रहती।
आज सोचता हूँ...
तब चाँद पाने की ज़िद थी,
लेकिन ख़ुशी तो,
तितली के पीछे दौड़ने में मिल जाती थी।
तब जेब में पैसे कम थे,
पर दोस्तों की हँसी बहुत थी।
ज़िम्मेदारियाँ नहीं थीं,
इसलिए हर दिन,
एक नया त्योहार लगता था।
अब सबके पास,
अपनी-अपनी मंज़िलें हैं,
अपनी-अपनी दौड़ है,
अपना-अपना आसमान है।
लेकिन जब भी कहीं
बच्चों को गली में क्रिकेट खेलते देखता हूँ,
मन चुपके से मुस्कुरा उठता है।
लगता है...
चाँद तो आज भी उतना ही दूर है,
पर बचपन...
वह आज भी वहीं खड़ा है,
किसी गली के मोड़ पर,
हाथ में पुराना बैट लिए,
और आवाज़ लगा रहा है…
"एक खिलाड़ी और चाहिए... खेल शुरू करते हैं!"
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर