दूर गगन की बारिश लिख दी,
जाने की तैयारी लिख दी।
मैंने तेरी ख़ामोशी पढ़कर,
अपनी सारी बारी लिख दी।
होंठ हँसते रहे ज़माने भर,
आँखों ने लाचारी लिख दी।
कल तक जिस घर में साँसें थीं,
आज वही वीरानी निकली।
दीवारों ने कुछ भी न बोला,
दरवाज़ों ने भारी लिख दी।
एक कबूतर ख़त ले आया,
स्याही थी पर शब्द नहीं थे।
उसने केवल नाम तुम्हारा,
बाक़ी सब लाचारी लिख दी।
सूखे पत्ते शाख़ से बोले,
मौसम का क्या दोष बताना।
जिसने जड़ से नाता तोड़ा,
उसने ही पतझारी लिख दी।
चाँद सितारे छत पर उतरे,
पूछ रहे थे हाल हमारा।
मैंने हँसकर बात बदल दी,
चाँद ने मगर सवारी लिख दी।
नदिया बोली सागर से यूँ,
मिलना मेरा भाग्य नहीं है।
लहरों ने हर रोज़ किनारे,
आकर नई दुश्वारी लिख दी।
जिस चौखट पर दीप जले थे,
अब सन्नाटा पहरा देता।
वक़्त ने आकर उसी जगह पर,
यादों की मंगलकारी लिख दी।
लोग कहेंगे भूल भी जाओ,
दिल कैसे फ़रमान माने।
धड़कन ने हर साँस के ऊपर,
तेरी हिस्सेदारी लिख दी।
अब जो मिलना हो भी जाए,
वैसी बात कहाँ रह जाएगी।
उम्र ने अपने काँपते हाथों,
रिश्तों की फनकारी लिख दी।
दूर गगन की बारिश लिख दी,
जाने की तैयारी लिख दी।
मैंने अपनी पूरी उम्र ही,
तेरे नाम उधारी लिख दी।
-रतन कुमार कैथवास
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