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तैयारी नाकाफी है

                
                                                         
                            उसके आने की खबर मिली, तो महफ़िल सजाने को कहा,
                                                                 
                            
हर कोने को सँवारने और, हर दीप जलाने को कहा।
जब सामने जाकर देखा, तो हर सपना अधूरा था,
जिस पर सबसे ज़्यादा भरोसा था, इंतज़ाम उसी का नाकाफ़ी था।

उसके ख़ातिर फूल मँगाए, ख़ुशबू का इंतज़ाम किया,
दिल ने अपनी हैसियत से बढ़कर हर इक काम किया।
मगर हक़ीक़त सामने आई, तो दिल को समझाना पड़ा,
जितना सोचा था काफ़ी होगा, उससे ज़्यादा जुटाना पड़ा।

ख़बर सुनकर ही लगा था, अब कोई कमी न रह जाएगी,
मेरी मेहनत की हर कोशिश, उसकी नज़रों में आ जाएगी।
मगर जब वक़्त आया, तो तस्वीर कुछ और ही निकली,
तैयारी अपनी पूरी थी, पर ज़रूरत उससे बड़ी निकली।

कुछ ख़्वाबों के लिए अक्सर, हर सामान कम पड़ जाता है,
दिल चाहे जितना कर ले, कुछ न कुछ रह जाता है।
सिर्फ़ चाहत से कहाँ पूरी, हर महफ़िल की शान होती है,
कभी नीयत तो मुकम्मल होती है, मगर तैयारी नाकाफ़ी होती है।

अबकी बार ख़बर मिले तो, पहले पूरा हिसाब करेंगे,
कितनी चाहत, कितना सामान, हर पहलू लाज़वाब करेंगे।
सिर्फ़ जोश में आकर अब हम, कोई दावा नहीं करेंगे,
जब तक पूरा बंदोबस्त न हो, आने का वादा नहीं करेंगे।
रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
12 घंटे पहले

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