तेरे अफ़साने लिखूँ या तेरी तफ़्तीश,
क्यों मेरे शहर के लोगों को, इत्मीनान से जीने नहीं देते।
तेरी हर एक अदा में, कोई साज़िश नज़र आती है,
मुस्कुराहट कम, ज़्यादा कोई तफ़्तीश नज़र आती है।
हमने तो चाहा था, मोहब्बत का चराग़ जलाए रखें,
तुम हर गली में, नफ़रत की ताबीज लिए फिरते हो।
हर चौक पर, सवालों की अदालत लगा रखी है,
हर चेहरे पे, वफ़ादारी की रसीद लिए फिरते हो।
जिस शहर में बच्चे, कभी पतंगों के पीछे दौड़ते थे,
अब वहाँ लोग, अपनी ही परछाई से डरे फिरते हैं।
तुम्हें अफ़वाहों का कारोबार, मुबारक हो साहिब,
हम तो सच की ख़ामोश, तहरीर लिए फिरते हैं।
हर बात को इल्ज़ाम की चादर में, क्यों ढक देते हो,
क्यों हर रिश्ते की गर्दन पर, शमशीर लिए फिरते हो।
तेरे अफ़साने लिखूँ या तेरी तफ़्तीश,
ये फ़ैसला अभी तक मुकम्मल नहीं हुआ,
क्योंकि तेरी कहानी में, किरदार भी तुम हो,
और मुंसिफ़ भी, तुम ही बने फिरते हो।
ज़रा इतना तो रहने दो, कि लोग सुकून से साँस ले सकें,
हर घर को अदालत, हर महफ़िल को कटघरा मत बनाओ।
शहर तब आबाद होते हैं,
जब भरोसे की चौपालें लगती हैं,
हर दस्तक को तफ़्तीश का वारंट नहीं बनाया जाता।
-रतन कुमार कैथवास
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