लब पर कोई शिकवा भी आने नहीं पाता है,
चेहरे का उजाला ही फ़रमान-सा चलता है।
ज़ुल्फ़ों की घटा छाए, मौसम भी बदल जाए,
सूखा हुआ दरिया भी उस पल तो मचलता है।
काजल की लकीरों में सदियों का असर होगा,
इक तीर निगाहों का हर दिल में उतरता है।
पायल की सदा सुनकर गलियों का सुकूँ टूटे,
हर बंद दरवाज़ा भी चुपके से बहलता है।
होंठों की हँसी जैसे बारिश की पहली बूँद,
पत्थर का भी सीना तब मोम-सा पिघलता है।
दर्पण भी उसे देखे तो ख़ुद पर ही रश्क करे,
हर शख़्स उसी जैसा बनने को सँवरता है।
महफ़िल में बहुत चेहरे आते हैं, चले जाते हैं,
पर नाम उसी का ही साँसों में ठहरता है।
कहते हैं मोहब्बत में तर्क़-ए-नज़र आसान नहीं,
जिस दिल में वो बस जाए, मुश्किल से निकलता है।
-रतन कुमार कैथवास
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