हँसते ज़ख़्म पर नमक न छिड़को, दर्द अभी बेहोश नहीं,
दिल पत्थर हो जाए लेकिन, धड़कन अब ख़ामोश नहीं।
काफ़िर हूँ तो कह लो मुझको, कायर मैं हरगिज़ नहीं,
सच की ख़ातिर सिर झुक जाए, ऐसा मेरा फ़र्ज़ नहीं।
सब्ज़बाग़ की बातें करके, झूठी आस जगाता नहीं,
जो भी कहता हूँ आँखों में, उससे कभी छुपाता नहीं।
पिघले लावों से प्यार बहुत, ठंडी राख पसंद नहीं,
आग अगर सीने में जागे, फिर डरने का छंद नहीं।
मैंने आँधी से सीखा है, दीपक कैसे जलते हैं,
जो तूफ़ानों से आँख मिलाएँ, वो ही आगे बढ़ते हैं।
दरिया मुझको रोक न पाया, साहिल भी मुझको थाम न पाया,
पैरों में छाले थे लेकिन, मंज़िल ने इल्ज़ाम न दी।
जिसने काँटों को अपनाया, फूल उसी के द्वार गए,
जो दुख से रिश्ता जोड़ गया, उसके हिस्से हार गए।
चेहरों की रंगत क्या देखूँ, दिल का मौसम पढ़ता हूँ,
टूटी आवाज़ों में भी मैं, उम्मीदों को गढ़ता हूँ।
दौलत से किरदार न मापो, यह सौदा बाज़ार नहीं,
इंसानों की कीमत होती, सोने-चाँदी हार नहीं।
सूरज बनना आसान कहाँ, पहले ख़ुद जलना पड़ता है,
अपने भीतर बैठे डर को, रोज़ बदलना पड़ता है।
मुझको मेरी आग सलामत, मुझको मेरा सत्य अज़ीज़,
झूठ अगर आराम भी दे दे, उसका मुझसे नाता न सोच।
इतना ही पैग़ाम मेरा है, सुन लो ऐ अहले-जहाँ…
सीना रखो पहाड़ों जैसा,
दिल रखो दरिया की शान।
काफ़िर कहना मंज़ूर मुझे,
कायर कहना अपमान।
-रतन कुमार कैथवास
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