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मसालों के पैरोकार

                
                                                         
                            मालाबार तट पर मसालों की खुशबू इतनी लुभावन लगती है,
                                                                 
                            
जैसे हवाओं में कोई पुरानी दास्ताँ पिघलती है।
इलायची की महक हो या काली मिर्च की रवानी,
हर साँस में मिट्टी की अपनी पहचान मिलती है।

समंदर की लहरें जब चट्टानों से टकराती हैं,
तो मसालों की खुशबू दूर तलक जाती है,
व्यापारी आते हैं सौदों की गठरी लेकर,
मगर यहाँ की मिट्टी अपनी कीमत खुद बताती है।

दालचीनी की गर्मी हो, लौंग की तासीर हो,
हर खुशबू में सदियों की कोई तस्वीर हो,
जिसे तुम सिर्फ़ बाज़ार का सामान समझते हो,
वही यहाँ की रगों में बसी हुई तक़दीर है।

मालाबार की हवाएँ जब चेहरे को छूती हैं,
तो यादों की बंद खिड़कियाँ धीरे-धीरे खुलती हैं,
यहाँ मसाले सिर्फ़ स्वाद नहीं, तेवर भी हैं…
जो ज़िंदगी को भी खुशबूदार बना देती हैं।

मसालों की खुशबू से पहचान हमारी है,
इस मिट्टी की महक ही शान हमारी है,
तुम दाम लगाकर परखते रहो बाज़ार में…
हमारे लिए तो यही खुशबू जान हमारी है।
-रतन कुमार कैथवास
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1 सप्ताह पहले

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