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कुछ नहीं में बहुत कुछ हो सकता है

                
                                                         
                            उसकी ख़ामोशी के पीछे बहुत कुछ है,
                                                                 
                            
दर्द भी हो सकता है, बेहिसाब ख़ुशी भी कुछ है।

जो लफ़्ज़ों में कभी कह नहीं पाता है वो,
उसकी आँखों में छुपी कोई कमी भी कुछ है।

वो हँसता है तो समझ लेना सब ठीक नहीं,
उसकी मुस्कान के पीछे थोड़ी नमी भी कुछ है।

कभी बेवजह दूर चला जाता है मुझसे,
शायद दिल में कोई अनकही बेचैनी भी कुछ है।

हर बात का जवाब लफ़्ज़ों में कहाँ होता है,
उसकी चुप्पी में भी एक पूरी कहानी कुछ है।

हमने समझा उसे ख़ुश देखकर बेफ़िक्र बहुत,
क्या पता उस ख़ुशी में कोई उदासी भी कुछ है।

वो कहता है “कुछ नहीं”, तो यक़ीं मत करना,
उसके इस “कुछ नहीं” में बहुत कुछ बाकी भी कुछ है।

पता करो इस कुछ को और ठीक करो,
तभी तो कहानी मुकम्मल होगी, कुछ समझे |
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 दिन पहले

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