तुम्हारे सामने आईना नहीं था, बस एक ख़्वाब जवाँ था,
आँखों में मंज़िल का नक़्शा, दिल में कुछ कर दिखाने का अरमान था।
चेहरा नहीं तलाश रहे थे, ख़ुद को पहचानने में लगे थे,
सोई हुई दुनिया के बीच तुम, भविष्य के ताने-बाने बुनने में लगे थे।
तुम्हारी आँखों में नींद नहीं, कुछ कर गुज़रने का तूफ़ान था।
नज़र के सामने हक़ीक़त नहीं, कल्पनाओं का आसमान था,
हर मुश्किल से आगे जाने का, मन में एक अभियान था।
कभी रास्तों पर सोचते थे, कभी मंज़िल पर विचार करते,
कैसे बदलेंगी परिस्थितियाँ, इसी पर सवाल हज़ार करते।
तुम्हारे भीतर चलता मंथन, हर प्रश्न का समाधान था।
कभी ख़ुद से सवाल करते, कभी ख़ुद ही जवाब बनाते थे,
जो राह कहीं दिखती नहीं थी, उसका नक़्शा बनाते थे।
कहाँ कमी है कोशिश में, कहाँ इरादे कमज़ोर पड़े,
किस मोड़ पर मेहनत बढ़ानी है, किन राहों पर पाँव धरें।
तुम्हारा हर एक विचार, आने वाले कल का सोपान था।
न ख़्वाबों को दोष दिया तुमने, न क़िस्मत को इल्ज़ाम दिया,
मुश्किलों के हर पत्थर को, तुमने मेहनत का नाम दिया।
सोच अगर सच्ची हो मन में, तो राहें निकल ही आती हैं,
बंद पड़े दरवाज़ों से भी, उम्मीदें राह बनाती हैं।
तुम्हारे दृढ़ संकल्प में ही, सफलता का प्रमाण था।
तुम्हारे सम्मुख शीशा होता, तो चेहरा नज़र में आता,
स्वप्न न होते आँखों में, तो मन किस ओर भटकता जाता।
जाग रहा था दिमाग तुम्हारा, भविष्य का संसार रचने में,
एक-एक विचार को ढाल रहे थे, सपनों को साकार करने में।
वो केवल सपना नहीं था, तुम्हारे कल का निर्माण था।
-रतन कुमार कैथवास
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