काग़ज़ की तुम नाव बना दो,
हाथों में पतवार थमा दो,
रूठ के पंछी उड़ न पाएँ,
लौट के फिर जहाज़ पर आएँ।
बिखरे सपनों को फिर जोड़ो,
टूटी आस को राह दिखा दो,
भटके मन को बाँह पकड़कर,
अपने घर की ओर बुला दो।
सूनी आँखों में रंग भर दो,
होठों पर मुस्कान सजा दो,
जो मौसम रूठे बैठे हैं,
उनको फिर से अपने गीत सुना दो।
दूर गए जो अपने हमसे,
उनको प्रेम का संदेशा भिजा दो,
जिस दिल में अब दर्द बसा है,
उस दिल को थोड़ा चैन दिला दो।
तूफ़ानों से डरकर अक्सर,
कश्ती साहिल छोड़ न पाए,
तुम उम्मीद की लौ जलाना,
हर पतवार मंज़िल तक जाए।
काग़ज़ की तुम नाव बना दो,
हाथों में पतवार थमा दो,
रूठे पंछी लौट के आएँ,
ऐसा कोई गीत सुना दो।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X