मैं ज़िंदगी हूँ,
तुझे जीना सिखा रही हूँ,
बहुत फड़फड़ा मत,
थोड़ा थम के बात किया कर,
अभी तो मेरे पूरे मौसम भी नहीं देखे तूने।
अभी तो बस धूप मिली है,
छाँव का पता कहाँ है तुझे,
हर फूल को अपना समझ बैठा,
पतझड़ का पता कहाँ है तुझे।
ज़रा वक़्त के संग चला कर,
हर मोड़ पर फ़ैसला मत किया कर।
अभी तो तालियों की आवाज़ सुनी है,
ख़ामोशी का शोर कहाँ सुना है तूने,
जो आज तेरे साथ चलते हैं,
कल बिछड़ भी सकते हैं।
हर चेहरे पर ऐतबार मत किया कर,
थोड़ा लोगों को परखा भी कर।
मैं कभी नदी बनकर बहूँगी,
कभी समंदर-सी गहरी हो जाऊँगी,
कभी पर्वत बनकर तेरे सामने खड़ी रहूँगी,
कभी रास्ता बनकर ख़ुद ही बिछ जाऊँगी।
हर लहर से घबराया मत कर,
किनारों का भी इंतज़ार किया कर।
तुझे जीत का नशा भी दूँगी,
हार का ज़हर भी चखाऊँगी,
कभी अपनों से मिलाऊँगी,
कभी अपनों से ही रुलाऊँगी।
हर दर्द पर शिकवा मत किया कर,
कुछ ज़ख्मों को दुआ समझ लिया कर।
अभी तो तेरे पाँव में रफ़्तार बहुत है,
इसलिए ठोकरें भी तेरा इंतज़ार कर रही हैं,
जब चलना संभलकर सीख जाएगा,
रास्ते ख़ुद तेरा सम्मान करेंगे।
हर मंज़िल को आख़िरी मत समझा कर,
सफ़र से भी रिश्ता बनाया कर।
याद रख...
मैं ज़िंदगी हूँ,
किसी की दुश्मन नहीं,
किसी की हमेशा की, हमसफ़र भी नहीं।
मैं तो बस वही लौटाती हूँ,
जो इंसान अपने कर्मों से बोता है।
इसलिए बहुत फड़फड़ा मत,
थोड़ा ठहर, थोड़ा मुस्कुरा,
और हर पल को, पूरे होश से जिया कर।
क्योंकि अभी तो तूने,
मेरे बसंत की महक नहीं देखी,
बरसात की भीगी दुआएँ नहीं देखीं,
पतझड़ का धैर्य नहीं देखा,
सर्दियों की तन्हाई नहीं देखी।
अभी तो मेरे पूरे मौसम भी नहीं देखे तूने...
फिर इतनी जल्दी,
मेरे बारे में फ़ैसला क्यों कर लिया तूने?
-रतन कुमार कैथवास
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