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जंग लगे हों ज़ख्मों पर

                
                                                         
                            जब जंग लगे हों ज़ख्मों पर, फिर अपना जहाँ कैसे भावे,
                                                                 
                            
दिल में धुआँ भरा हो जब, कोई रंग कहाँ मन को भावे।

जिन राहों पर दर्द मिला हो, उन राहों पर कौन मुस्कावे,
जिस चौखट ने ठुकराया हो, मन फिर क्यों उसको अपनावे।

आँखों में जब रात बसी हो, चाँद भी फीका-फीका लागे,
टूटे सपनों की किरचों पर, कोई फूल कहाँ खिल पावे।

अपने ही जब घाव कुरेदें, गैरों से क्या शिकवा करना,
जिसे समझा था अपना सबसे, वही अगर पत्थर बन जावे।

मन के भीतर राख बची हो, बाहर चाहे मौसम सावन,
भीतर सूखा पड़ा हो जब, बादल भी किसको हरसावे।

जब जंग लगे हों ज़ख्मों पर, फिर अपना जहाँ कैसे भावे,
दिल को अपना दर्द ही प्यारा… दुनिया चाहे जो समझावे।
-रतन कुमार कैथवास
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