किताब से सीखने पर नींद आ जाती है,
जब ज़िंदगी सिखाती है तो आँखों से नींद उड़ जाती है।
ये कैसा फ़लसफ़ा है,
तूफ़ान आने से पहले सायं-सायं की ख़ामोशी क्यों छा जाती है।
शायद इसलिए कि कुदरत भी,
हर हादसे से पहले इशारा करती है,
पेड़ों के पत्ते भी सहमकर ठहर जाते हैं,
हवा अपनी चाल बदल लेती है,
और परिंदों की आवाज़ भी कहीं खो जाती है।
एक रात मैं भी यूँ ही,
बरामदे में बैठा, आसमान को पढ़ रहा था,
चाय ठंडी हो चुकी थी,
मगर दिल में उठते सवाल अभी भी गर्म थे,
लग रहा था जैसे कोई अनकहा किस्सा,
मेरे दरवाज़े तक चला आ रहा हो।
सुबह हुई तो, कोई तूफ़ान बाहर नहीं आया,
लेकिन भीतर, बहुत कुछ उजड़ चुका था।
कुछ अपने चेहरे बदल चुके थे,
कुछ रिश्ते अपनी परिभाषा,
और कुछ भरोसे बिना शोर किए,
हमेशा के लिए घर छोड़ गए थे।
तब समझ आया…
ज़िंदगी, किताबों की तरह, अध्याय नहीं बदलती,
वो तो एक ही पन्ने पर,
पूरी उम्र का, हिसाब लिख देती है।
जहाँ एक आँसू भी,
सैकड़ों नसीहतों से, ज़्यादा पढ़ा-लिखा होता है।
अब जब कोई कहता है…
"वक़्त सबसे बड़ा उस्ताद है",
तो मैं मुस्कुरा भर देता हूँ।
क्योंकि उसकी फ़ीस,
सिर्फ़ वक़्त नहीं होती,
कई बार अपने, सपने, सुकून,
और मासूमियत भी चुकानी पड़ती है।
फिर भी सफ़र जारी है,
क्योंकि हर टूटन के बाद,
एक नया इंसान जन्म लेता है।
जो किताबों से नहीं,
अपने ज़ख़्मों के, हाशियों से पढ़ना सीख जाता है,
और जिसकी आँखों की जागी हुई रातें ही,
उसकी सबसे बड़ी डिग्री बन जाती हैं।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X