पहले जादू पर भी यक़ीन था,
अब हक़ीक़त पर भी शक है।
क्या मैं इतना बदल गया हूँ,
या दुनिया ही इतनी बदल गई है?
कल पुराने संदूक से,
बचपन की एक पतंग मिली।
उसकी डोर उलझी हुई थी,
रंग फीके पड़ चुके थे,
लेकिन उसे हाथ में लेते ही,
मुझे वही आसमान याद आ गया,
जहाँ हारने के बाद भी,
घर लौटते समय, मुस्कुराहट साथ आती थी।
तब हम मान लेते थे,
कि चाँद हमारे साथ-साथ चलता है,
तितलियाँ संदेश लेकर आती हैं,
और दादी की कहानियों में,
पेड़ भी बातें करते हैं।
किसी ने हमें समझाया नहीं था,
फिर भी यक़ीन बहुत था।
आज सबूत बहुत हैं,
लेकिन भरोसा कम है।
मोबाइल में सैकड़ों नंबर हैं,
मगर आधी रात को,
किसे फ़ोन करें…
यह सोचने में ही सुबह हो जाती है।
चेहरों पर मुस्कानें पहले से ज़्यादा हैं,
लेकिन आँखें,
पहले से ज़्यादा थकी हुई लगती हैं।
एक दिन मैंने आईने से पूछा…
"क्या मैं बदल गया हूँ?"
आईना बोला…
"चेहरा नहीं,
तुम्हारे सवाल बदल गए हैं।
पहले तुम दुनिया को देखकर,
अचरज करते थे,
अब हर चीज़ को देखकर,
संदेह करते हो।"
मैंने फिर पूछा…
"तो कसूर किसका है?
मेरा या इस ज़माने का?"
आईना मुस्कुराया।
बोला…
"वक़्त किसी को वैसा नहीं छोड़ता।
दुनिया ने तुम्हें, सावधान होना सिखाया,
और अनुभव ने तुम्हें संदेह करना।
लेकिन ध्यान रखना...
सावधानी बुद्धि की निशानी है,
हर चीज़ पर शक करना,
थके हुए दिल की।"
मैंने उस दिन,
पतंग की डोर फिर से सुलझाई।
उसे उड़ाया नहीं,
बस देर तक हाथ में पकड़े रखा।
क्योंकि समझ आ गया था…
ज़िंदगी का सबसे बड़ा जादू
हवा में उड़ती पतंग नहीं,
बल्कि वह दिल है,
जो टूटने के बाद भी,
किसी नए आसमान पर,
यक़ीन करना नहीं छोड़ता।
शायद दुनिया बदली है,
शायद मैं भी बदला हूँ।
अगर भीतर का एक छोटा-सा बच्चा,
अब भी किसी सुबह,
ओस की बूँद में इंद्रधनुष खोज ले,
तो समझना...
जादू कहीं गया नहीं,
हम ही उसे देखने की उम्र से,
थोड़ा आगे निकल आए हैं।
-रतन कुमार कैथवास
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