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जड़ों को भी वक्त दो

                
                                                         
                            मैंने पहले…
                                                                 
                            
ज़मीन को सींचना सीखा,
फिर शाख़ों की ख़ैरियत पूछी।
जो लोग केवल फूलों पर इतराते रहे,
वे पहली आँधी में पहचान खो बैठे,

जिन्होंने जड़ों को अपना वक़्त दिया,
उनके पेड़ हर मौसम में हरे भरे खड़े रहे।
रिश्ते भी, दरख़्तों जैसे ही होते हैं,
ऊपर से, मुस्कुराहटें टाँग देने भर से,
ज़िंदगी नहीं खिलती,
नीचे जमीन में भरोसे की नमी चाहिए।

घर की चौखट पर,
यदि सम्मान की मिट्टी बिखर जाए,
तो महँगे पर्दे भी,
उजाला नहीं रोक पाते।
नदियाँ भी समंदर तक,
सिर्फ़ पानी लेकर नहीं पहुँचतीं,
वे पहाड़ों का विश्वास,
जंगलों की दुआ,
और मिट्टी का धैर्य साथ लाती हैं।

इसलिए मैं हर बार,
जड़ों की ख़बर लेता हूँ,
शाख़ों की ऊँचाई से पहले,
बुनियाद की गहराई नापता हूँ।

क्योंकि मुझे मालूम है…
फल शाख़ों पर लगते हैं,
मगर उनका जन्म जड़ों की ख़ामोशी में होता है।
और याद रखना…
जिस दिन, जड़ें प्यास से हार जाएँगी,
उस दिन पत्तियों की हरियाली भी
सिर्फ़ तस्वीरों में रह जाएगी।
सच तो यही है…
कि जड़ें यदि सूख जाएँ,
तो पत्तियाँ कभी हरी नहीं होतीं।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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