रियासत, सियासत, हैरत-अंगेज़ नुस्ख़े, ये सब क्या कर रहे हैं,
ताज़ी हवा को आख़िर, क्यों ख़राब कर रहे हैं?
किस बात का इतना शोर है, हर इक चौपाल में,
लोग अपने ही लहू का, क्यों हिसाब कर रहे हैं?
नफ़रत के सौदागर, बड़ी फ़ुर्सत में बैठे हैं,
मोहब्बत के दरख़्तों को, बेहिसाब कर रहे हैं।
सच बोलने वालों की, ज़बानें काँपती क्यों नहीं हैं,
झूठ को लोग क्यों, लाजवाब कर रहे हैं?
दीवारें ऊँची करके, ख़ुद को जीता हुआ समझ बैठे,
आपस के सारे रिश्ते, ख़राब कर रहे हैं।
चेहरों पे मुस्कानें हैं, दिलों में धुआँ-धुआँ,
कैसे लोग मौसमों को भी, अज़ाब कर रहे हैं।
नदियों का पानी मैला, हवाओं में ज़हर घुला,
फिर भी तरक़्क़ी का, बड़ा हिसाब कर रहे हैं।
मस-अला कुर्सियों का है, या ज़मीर का कहीं,
क्यों हर सवाल को, लोग ख़िताब कर रहे हैं?
ज़माना याद रखेगा, ये दौर भी एक दिन,
जब लोग इंसानियत से भी, मुँह मोड़ रहे हैं।
चलो कोई चराग़, फिर इंसानियत का जला दें,
बहुत लोग रौशनी को भी, ख़राब कर रहे हैं।
-रतन कुमार कैथवास
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