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ईमानदारी साथ ले जाना

                
                                                         
                            हर सुबह उनके चेहरे पर,
                                                                 
                            
उम्मीद का एक सूरज उगता है,
मेरी हर छोटी कोशिश में भी,
उन्हें आने वाला कल दिखता है।
उन्होंने कभी दौलत नहीं माँगी,
न ऊँचे महलों की ख्वाहिश जताई,
बस इतना कहा…
"बेटा, जहाँ भी जाना,
ईमानदारी साथ ले जाना,
ताकि लोग मेरे नाम से पहले,
तेरा नाम मुस्कुराकर दोहराएँ।"
मैंने पूछा…
"पापा, अगर रास्ते कठिन हुए तो?"
वो हँसकर बोले…
"पहाड़ कभी पैरों से नहीं,
इरादों से छोटे होते हैं,
और मंज़िल उन्हें मिलती है,
जो ठोकरों को भी अपना उस्ताद मान लेते हैं।"
अब जब भी थककर बैठता हूँ,
उनकी हथेलियों की दरारें याद आती हैं,
जिनमें मेरी हर जीत का सपना,
बरसों से पल रहा है।
तब लगता है,
आराम नहीं,
अभी सफ़र बाकी है।
नाम कमाना सिर्फ़ अख़बारों में छपना नहीं,
किसी की दुआ बन जाना भी है,
किसी रोते हुए चेहरे पर,
मुस्कान का कारण कहलाना भी है,
शायद यही वो विरासत है,
जो पापा मुझे देकर जाना चाहते हैं।
इसलिए अब हर दिन,
अपने डर से थोड़ा आगे निकलता हूँ,
हर हार से कुछ सीखकर,
फिर नए हौसले के साथ संभलता हूँ।
क्योंकि मंज़िल सिर्फ़ मेरी नहीं,
उन आँखों का सपना भी है,
जो आज भी मुझ पर,
बिना किसी शर्त के भरोसा करती हैं।
एक दिन जब लोग पूछेंगे,
"तुम्हारी सबसे बड़ी पहचान क्या है?"
मैं मुस्कुराकर बस इतना कहूँगा…
"मैं वही हूँ,
जिसे, उसके पापा ने…
अच्छा इंसान बनने का सपना दिया था,
और उसी सपने को,
अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सम्मान बना लिया।"
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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