मैंने आँधियों से लड़कर अपनी साँसें बचा रखी हैं,
डर बस इतना है, अपना शहर ही बेगाना न हो जाए।
जिन काँटों ने राह रोकी, उनको भी हँसकर सह डाला,
अब फूलों की नरमी से ही दिल को छलावा न हो जाए।
रात भर जागा हूँ मैं, ख़्वाबों का दीप जलाने को,
सुबह की पहली किरण कहीं आख़िरी दुआ न हो जाए।
हार का मतलब सीखा ही नहीं मेरी तक़दीर ने अब तक,
जीत की जल्दबाज़ी में अपना ही नुक़सान न हो जाए।
मैंने अपने अश्कों को भी हिम्मत का नाम दिया है,
वरना इन आँखों का दरिया कहीं बेवफ़ा न हो जाए।
जो भी कहना है, आज कहो, वक़्त कहाँ ठहरा करता है,
कल की ख़ामोशी का बोझ उम्र भर सज़ा न हो जाए।
मेरे भीतर आग अभी तक राख नहीं बनने पाई है,
बस डर इतना है, ये शोला किसी का जहाँ न जला जाए।
मैं तो हर तूफ़ान से लड़ने का हौसला रखता हूँ,
लेकिन अपने ही दिल का मौसम ख़ुद से ख़फ़ा न हो जाए।
चलो मुस्कुराकर जी लेते हैं, दर्द को हमराज़ बनाकर,
कौन जाने अगला लम्हा किस मोड़ पर एक हादसा न हो जाए।
-रतन कुमार कैथवास
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